Thursday, October 7, 2010

‘काग भगोड़ा’ उर्फ ‘बिजूका’

आज पितृ मोक्ष अमावस्या है। महालय की समाप्ति का दिन।महालय का प्रारंभ भाद्रपक्ष की स्नानादि पूर्णिमा के साथ शुरू हुआ। उस दिन हमने अगस्त्य-तर्पण किया। दूसरे दिन अश्विन मास तथा पितृपक्ष का प्रारंभ हुआ और हमने प्रतिपदा श्राद्ध किया। फिर द्वितिया ,तृतिया , चतुर्थी , पंचमी, षष्ठी का श्राद्ध किया । फिर किया सप्तमी श्राद्ध और इसी दिन महालक्ष्मी के हाथी का पूजन किया। अष्टमी श्राद्ध के दूसरे दिन नवमी के श्राद्ध को मातृ नवमी के रूप में मनाया और संयोग से बापू यानी महात्मा गांधी की जन्म तिथि भी मनाई। फिर दशमी और एकादशी का श्राद्ध किया। द्वादशी के श्राद्ध को संन्यासी , यति ओर वैष्णवों का भी श्राद्ध था। त्रयोदशी श्राद्ध के साथ प्रदोष-व्रत भी किया। चतुर्दशी श्राद्ध में उन मृतको का श्राद्ध किया जो शस्त्रपात से अपघात को प्राप्त हुए थे। इसे नाम दिया शस्त्रपात मृतका श्राद्ध।
आज है अज्ञात तिथि श्राद्ध। अमावस्या श्राद्ध। सानी पितृमोक्ष अमावस्या-- पितृविसर्जन ? महालय समाप्त।

इस पूरे प्रकरणों में हमारी हार्दिक इच्छाएं थीं कि हमारे पितृ ,जाने अनजाने ,जो ‘महालय’ को उपलब्ध न हो पाये हों वे हो जाएं। सोलह दिन हमारे कठिन प्रयास का कुछ तो फल निकलेगा।  इस दिन काग भगोड़े या बिजूका आदि हमने नहीं खड़े किये। ये तो कौओं को भगाने के लिए होते हैं। हम स्वयं खड़े हो गये और प्रार्थना करते रहे कि आव ! आव !!
और वे कांव कांव करते आते गए।